Breaking News

सावधानः पांच साल में दिल्ली के 17 लाख लोगों को सांस की बीमारी

पांच वर्षों के दौरान दिल्ली में 17 लाख लोग सांस की बीमारी के शिकार हुए हैं। इनमें से 981 की मौत हो चुकी है। इसकी मुख्य वजह हवा का प्रदूषित होना है। इस बात की जानकारी विज्ञान एवं प्रौद्यौगिकी और पर्यावरण मंत्रालय से संबद्ध संसदीय समिति ने मंगलवार को दी। समिति के अनुसार ये आंकड़े स्वास्थ्य मंत्रालय के हैं।

समिति ने एनसीआर में प्रदूषण को लेकर अपनी रिपोर्ट मंगलवार को संसद में पेश की है। रिपोर्ट में 2013-17 के दौरान श्वसन संबंधी बीमारियों एवं मौतों का जिक्र किया गया है। इसमें कहा गया है कि हवा में पीएम 2.5 एवं पीएम 10 की मात्रा मानकों से कई गुना बढ़ गई है। यह दिल्ली, एनसीआर में मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ पशु-पक्षियों एवं वनस्पतियों तक को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है।

गांव के लोगों से डेढ़ गुणा संक्रमण का खतरा

समिति ने बताया है कि दिल्ली में रह रहे लोगों को गांव में रहने वाले व्यक्ति की तुलना में श्वसन संबंधी संक्रमण का खतरा 1.7 गुना ज्यादा है। इसी प्रकार अस्थायी संक्रमण की दर भी दिल्ली में 7.6 फीसदी तक आंकी गई है। यह सामान्य आबादी के औसत 3.9 से ज्यादा है। इसी प्रकार दिल्ली वालों के फेफड़े की कार्यक्षमता में भी गिरावट आई है। समिति ने विश्व बैंक की रिपोर्ट का जिक्र कर कहा कि 2013 में वायु प्रदूषण के कारण देश को 55.39 अरब डॉलर के श्रम का नुकसान हुआ था। यह सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी का 0.84 फीसदी के बराबर है। समिति ने यह भी कहा कि दिल्ली में ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाए जाएं। कुछ स्थानों पर मेट्रो पिलर के चारों ओर पेड़ लगाए जाने को अच्छी पहल बताया।

दिल्ली में प्रदूषण की बड़ी वजह आसपास बने नए शहर
समिति ने कहा कि दिल्ली में प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह इनके आसपास बसे नए शहर हैं। पहले दिल्ली के चारों ओर पेड़-पौधे हुआ करते थे। आज जरूरत इस बात की है कि दिल्ली के चारों तरफ पेड़ों की बाड़ लगाई जाए। बड़े पैमाने पर पौधरोपण किए जाएं। इससे दिल्ली में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश से आने वाले धूल प्रवेश नहीं कर पाएंगे। राजधानी को हरा-भरा रखने के लिए ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने को कहा गया है।

पेड़ काटने पर पाबंदी लगे
– दिल्ली के भीतर विकास योजनाओं के नाम पर पेड़ नहीं काटे जाएं। विशेष परिस्थितियों में न्यूनतम पेड़ ही काटे जाएं
– दिवाली पर दिल्ली पटाखों से गैस चैंबर बन जाती है, इसलिए पटाखों का इस्तेमाल कम से कम हो। चीनी पटाखों पर रोक लगे
– कूड़े के ढेर का वैज्ञानिक तरीके से निपटान किया जाए
– पर्यावरण पर गठित उच्च स्तरीय टास्क फोर्स में स्वास्थ्य मंत्रालय को भी शामिल किया जाए
– दिल्ली, एनसीआर में सभी एजेंसियां मिलकर कार्य करें। रेल एवं विमानन मंत्रालय से भी मदद ली जाए

loading...
loading...