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लश्कर के आतंकी का खुलासा, लखवी के बेटे की मदद से 6 आतंकी ऐसे पहुंचे भारतीय सीमा तक

आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के 6 आतंकियों में से पांच 20 मार्च को सेना के एक अभियान में मारे गए थे। वहीं छठा आतंकी जैबुल्ला वहां से फरार हो गया था, जिसे बाद में सुरक्षाबलों ने गिरफ्तार कर लिया था। सभी आतंकी 6 लाख रुपये सहित टोयोटा कार से भारतीय सीमा तक पहुंचे थे। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने जब 20 वर्षीय जैबुल्ला से पूछताछ की तो उसने बताया कि वह और उसके साथी जकीउर रहमान लखवी के बेटे की सहायता से भारतीय सीमा तक पहुंचे। 

 आतंकी ने बताया कि अंतिम दौर की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उसके ट्रेनिंग हेड हुजेफा ने उन 6 लोगों को चुना था। जिसके बाद लखवी के बेटे कासिम ने उन सबको एके-47 राइफल, एक किलो खजूर और बादाम, पांच बोतल शहद, 20 रोटियां और एक लाख रुपये (भारतीय मुद्रा) दी। बता दें लखवी 26/11 हमलों का मास्टर माइंड और ऑपरेशनल कमांडर है।

जैबुल्ला ने एनआईए को पूछताछ में आतंकियों के भारत आने के रास्ते के बारे में बताया। उसने बयान में कहा कि ये लोग पाकिस्तान के मुजफ्फराबाद से निकले थे। फिर वह पीओके के दुधनियाल और तेजिया में रुके। इसके बाद वह भारतीय सीमा में सरवर और तुसान बाला जुगतियाल के जंगलों से होते हुए कुपवाड़ा के हलमतपोरा पहुंचे।

आतंकी ने कहा कि इन लोगों को लखवी के बेटे कासिम की टोयोटा कार में मुजफ्फराबाद से सरवर तक पहुंचाया गया। उसने बयान में बताया कि ‘हमें एलओसी पहुंचने में दो दिन लगे, हमने उस रात बाड़ काटी और भारतीय सीमा में आ गए। हमारी मदद के लिए आए पांच अन्य लोग एलओसी से ही लौट गए। इसके बाद हमने जीपीएस की मदद से अपनी यात्रा शुरु की और भारतीय सेना की पोस्ट ढूंढी।’

जैबुल्ला ने आगे बताया कि वह लोग कुपवाड़ा के जंगलों में 15 दिनों तक छिपे रहे। कुछ स्थानीय कश्मीरियों ने उन्हें राशन भी मुहैया कराया। उसने कहा कि ’12 मार्च की शाम को हम लोग अल्ताफ और बिला के घर पहुंचे। हमारे ग्रुप लीडर वकास ने उनसे दाल, बिस्किट, बर्तन और मिल्क पाउडर खरीदा और बदले में 13,000 रुपये दिए। वहां हम 6 दिन रुके। इसके बाद हम 18 मार्च को दूसरे गांव फतह खान पहुंचे, वहां के लोगों ने हमें रखने से इंकार कर दिया। लेकिन बाद में उनमें से एक ने हमें खाना और रहने की जगह दी।’

उसने आगे कहा कि 20 मार्च को सेना ने इलाके को घेर लिया और फायरिंग शुरु कर दी। उसने कहा कि ‘हम सब उठ गए और अपने हथियार लेकर जंगलों की तरफ भागे। इसके बाद हम ढोक के एक घर में पहुंचे। जहां हमने उस घर के मालिक से कहा कि हम सब लश्कर-ए-तैयबा के सदस्य हैं और पाकिस्तान से आए हैं। उसी जगह पर एनकाउंटर में मेरे साथी मारे गए। लेकिन मैं भागने में सफल रहा। जिसके बाद जल्द ही मुझे भी पकड़ लिया गया।’

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