मोदी लहर भी नहीं भेद नहीं सकी थी विपक्ष के 7 किले

उत्तर प्रदेश में विपक्ष की किले रूपी सात ऐसी सीटें भी हैं जिन्हें कब्जाना भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। ये किले ऐसे चक्रव्यूह हैं जिन्हें 2014 के प्रचंड लहर में भी भाजपा भेद नहीं सकी थी। इस चुनाव में एक बार फिर से पूरे दमखम के साथ विपक्षी महारथी इन सीटों से चुनाव मैदान में हैं। मामूली बदलाव के तहत इस बार एक महारथी बदला है, नए महारथी के रूप में एक किले का मोर्चा सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने संभाल लिया है। 

भाजपा के सामने सातवें चक्रव्यूह के रूप में खड़ी इन सात सीटों में रायबरेली, अमेठी, आजमगढ़, कन्नौज, मैनपुरी, बदायूं और फिरोजाबाद लोकसभा सीट है। इन सीटों पर दो बड़े सियासी परिवारों के सदस्य काबिज हैं। 2014 में रायबरेली सीट से सोनिया गांधी, अमेठी सीट से राहुल गांधी, आजमगढ़ से मुलायम सिंह यादव, कन्नौज से डिंपल यादव, मैनपुरी से तेज प्रताप सिंह यादव, बदायूं से धर्मेंद्र यादव और फिरोजाबाद से अक्षय यादव सांसद चुने गए थे। ये ही वे सात सीटें हैं जिन्हें भाजपा नहीं जीत सकी थी। 

अमेठी

1977 और 1998 छोड़ दें तो 1967 से अब तक इस सीट पर कांग्रेस का ही कब्जा रहा है। कांग्रेस से 1980 में संजय गांधी, 1981, 1984, 1989 और 1991 में राजीव गांधी, 1996 में सतीश शर्मा, 1999 में सोनिया गांधी सांसद चुनी गई थीं। 2004, 2009 और 2014 में राहुल गांधी इस सीट से चुनाव जीते। इस बार फिर से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल उम्मीदवार हैं। भाजपा ने दूसरी बार स्मृति ईरानी को मैदान में उतारा है। 

रायबरेली

इस सीट पर 16 आमचुनाव और तीन उपचुनाव में से कांग्रेस ने 16 बार जीत दर्ज की है। 1977 में भारतीय लोकदल और 1996 और 1998 में बीजेपी ने इस सीट पर जीत दर्ज की थी। 2004 से लगातार सोनिया गांधी यहां से सांसद चुनी जा रही हैं। सोनिया गांधी फिर से यहां से प्रत्याशी हैं। उनके खिलाफ भाजपा ने एमएलसी दिनेश प्रताप सिंह को मैदान में उतारा है। इस बार यहां मुकाबला रोचक होने की उम्मीद है।

मैनपुरी

मुलायम परिवार के घर सैफई से सटा मैनपुरी सपा का गढ़ है। आजादी के बाद पांच बार कांग्रेस ने यह सीट जीती थी। वर्ष 1996 में पहली बार मुलायम मैदान में उतरे और जीत हासिल की। इसके बाद यहां से आज तक सपा हारी नहीं है। अब तक तीन बार मुलायम जीते हैं जबकि उनके सीट छोड़ने पर एक बार धर्मेंद्र यादव यह सीट जीते थे। 2014 में मुलायम द्वारा यह सीट छोड़े जाने के बाद उनके पौत्र तेज प्रताप यादव इस सीट से चुनाव जीते।

कन्नौज

पहली बार 1998 में सपा के कब्जे में यह सीट आई थी। इसके बाद से लगातार हुए चुनावों में यह सीट सपा के पास ही है। अखिलेश ने अपनी सियासी पारी का आगाज कन्नौज से 2000 में हुए उपचुनाव से किया था। इसके बाद अखिलेश ने लगातार तीन बार यहां से चुनाव जीते थे। अखिलेश के इस्तीफे के बाद उपचुनाव में इनकी पत्नी डिंपल चुनी गई थीं। 2014 में दूसरी बार डिंपल इस सीट से सांसद बनीं। डिंपल इस बार फिर मैदान में हैं।

बदायूं 

1991 में भाजपा से स्वामी चिन्मयानंद इस सीट से चुनाव जीते थे। इसके बाद कभी भाजपा इस सीट को नहीं जीत पाई। 1996 से अब तक हुए छह चुनावों में हर बार सपा ने यह सीट जीती है। 1996, 98, 99 तथा 2004 में सपा से सलीम शेरवानी सांसद चुने जाते रहे। इसके बाद 2009 व 2014 में सैफई परिवार से धर्मेंद्र यादव जीते। धर्मेंद्र इस चुनाव में भी यहां से सपा के प्रत्याशी हैं। 

फिरोजाबाद

सुहागनगरी फिरोजाबाद भी अब सैफई परिवार का मजबूत किला बन चुका है। इस सीट की भी गजब कहानी है। 1957 में बृजराज सिंह के बाद से कोई भी स्थानीय व्यक्ति यहां से सांसद नहीं चुना गया। 11 बार आगरा के नेता इस सीट से सांसद चुने गए हैं। 1999 और 2004 में सपा से रामजीलाल सुमन सांसद रहे। सैफई परिवार से 2009 में अखिलेश जीते। फिर उपचुनाव में कांग्रेस से राजबब्बर ने कब्जा किया। 2014 में सैफई परिवार से अक्षय यहां से सांसद चुने गए। अक्षय फिर से यहां से प्रत्याशी हैं। भाजपा से चंद्रसेन प्रत्याशी हैं जबकि प्रसपा से अक्षय के चाचा शिवपाल सिंह यादव मैदान में हैं।

आजमगढ़

आजमगढ़ मुलायम सिंह यादव द्वारा सैफई परिवार के लिए बनाया गया नया किला है। 2014 में कड़े संघर्ष के बाद मुलायम इस सीट को जीते थे। हालांकि करीब 70 हजार वोटों की जीत पर उन्होंने कई बार दुख भी व्यक्त किया था, फिर भी मैनपुरी छोड़ वे आजमगढ़ से ही सांसद रहे। 1996 से 2004 तक यह सीट कभी सपा के पास तो कभी बसपा के पास रही। 2009 में भाजपा से रमाकांत यादव जीते थे। इस बार सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव इस सीट से प्रत्याशी हैं। भाजपा ने भोजपुरी सिनेस्टार दिनेश लाल यादव निरहुआ को प्रत्याशी बनाया है। इस बार प्रतिष्ठा की इस सीट पर भी मुकाबला रोचक हो गया है।

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