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मेरठ में आधे वोटरों का दिल नहीं जीत पाते सियासी दल

पल्लवपुरम में रहने वाले सुकरमपाल गुरुग्राम की एक कंपनी में इंजीनियर हैं, लेकिन वोट नहीं डालते हैं। वह मूल रूप से जिटौली गांव के रहने वाले हैं। वह बमुश्किल बीस मिनट में घर से अपने पोलिंग बूथ पहुंच सकते हैं पर बीते कई चुनावों में वोट डालने नहीं गए। 

वोट क्यों नहीं देते? इस सवाल पर वो कहते हैं, कौन लंबी लाइन में लगे। हर वक्त पुलिस वोटरों को संदेह की नजर से देखती हैं। पता नहीं कब झगड़ा-फसाद हो जाए। और वोट डाल भी दें तो क्या बदलेगा। नेता सब एक हैं। कोई दल हो कोई प्रत्याशी हो, आम आदमी की समस्याओं का समाधान किसी के पास नहीं। सुकरम अकेले नहीं हैं, बीते दस लोकसभा चुनावों में उनकी तरह के 30 से 50 फीसदी तक वोटर ऐसे हैं जिन्होंने मेरठ लोकसभा सीट के लिए हुए चुनाव में वोट नहीं डाला। 
आखिर लोग वोट क्यों नहीं देते, इस सवाल को चुनाव आयोग ने भी 2009 के लोकसभा चुनाव में बेहद गंभीरा से लिया था। आयोग ने कम मतदान की वजह जानने के लिए सर्वेक्षण भी कराए। हमने इस मुद्दे पर राजनीति और समाजशास्त्र के विशेषज्ञों से बात की, तो पता चला कि राजनीतिक दल मेरठ में आधे वोटरों के दिलों तक नहीं पहुंच पाते। बीते दस लोकसभा चुनावों में जिस तरह से बड़ी संख्या में लोगों ने मतदान नहीं किया, वह चिंता का विषय है। हालांकि माना जा रहा है कि आगामी लोकसभा चुनावों में यह ट्रेंड बदलेगा और मतदान प्रतिशत में उछाल आएगा। 

दलों के सामने बड़ा सवाल पर अबकी वोटिंग बढ़ने की उम्मीद : प्रोफेसर एसके चर्तुवेदी

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में प्रति कुलपति रहे राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर एसके चतुर्वेदी कहते हैं कि इसके दो पक्ष हैं सैद्धांतिक और व्यवहारिक। सैद्धांतिक पक्ष यह है कि जनता चुनाव के जरिए अपनी समस्याओं के निदान की उम्मीद में वोटिंग करती है। जब जनता को समस्याओं के निदान की उम्मीद कम होती है तो वोटिंग प्रतिशत गिरता है। व्यवहारिक पक्ष यह है कि राजनीतिक दल वैचारिक रूप से अपना एजेंडा जनता के बीच रखते हैं जिसके आधार पर लोग जनप्रतिनिधि चुनते हैं। जब राजनीतिक दलों की विचार धाराएं लोगों को प्रभावित नहीं कर पातीं तो वोटिंग प्रतिशत कम हो जाता है। राजनीतिक दल अपने घोषणा पत्र आखिरी वक्त में जारी करते हैं। कई दल तो घोषणा पत्र जारी ही नहीं करते। इससे वोटरों को उनके एजेंडा पता नहीं चल पाते और वह सक्रिय नहीं हो पाते। जाति-धर्म और क्षेत्र का बंटवारा भी एक फैक्टर होता है। जिन जातियों के प्रत्याशी नहीं होते उनमें वोटिंग प्रतिशत कम हो जाता है। मतदान केंद्रों की दूरी, सुरक्षा इंतजाम, जागरुकता की कमी भी वोटिंग प्रतिशत पर सीधा असर डालती है। हालांकि बीते कुछ सालों में इनमें काफी सुधार हुआ है। उम्मीद है कि अबकी बार वोटिंग प्रतिशत बढ़ेगा। 

गरीब के लिए उत्सव, इलीट क्लास मनाता है छुट्टी : प्रोफेसर आलोक

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में प्रोफेसर डा. आलोक कुमार कहते हैं कि गरीब लोग चुनाव को एक उत्सव की तरह मनाते हैं। वह सुबह ही बूथों पर लाइन में लग जाते हैं। आमतौर पर इलीट क्लास वोटिंग के दिन को छुट्टी के तौर पर लेता है। इलीट क्लास की महिलाएं भी वोट डालने कम निकलती हैं। 
डा. आलोक कहते हैं कि मेरठ सुरक्षा के लिहाज से संवेदशनील है, इसलिए इलीट क्लास वोट डालने निकलने में असहज महसूस करता है। दलबदल, नेताओं के चिंतन, चरित्र और आचरण में खत्म हो रही असमानता भी बुद्धिजीवियों में सियासत प्रति विरक्ति पैदा करती है। जो लोग सोचने लगते हैं कि चाहे जो चुना जाए कोई अंतर आने वाला नहीं वह वोट डालने नहीं निकलते। 


किस लोकसभा चुनाव में कितने लोगों ने नहीं डाला वोट
2014            36.89
2009            50.00            
2004            47.56      
1999            40.43  
1998            39.64     
1996           48.2                                         
1989           43.11       
1984           35.3         
1980           37.71         
1977           32.14           


वक्त के साथ वोटिंग ट्रेंड में आया बदलाव : डा. योगेन्द्र विकल

शिक्षक नेता और राजनीति विज्ञान में असिस्टेंट प्रोफेसर डा. योगेन्द्र विकल बताते हैं कि एक वक्त था जब गांव की महिलाएं बुग्गियों में बैठ गीत गाते हुए वोट डालने जाती थीं। तब नेता घर-कुनबे के जिम्मेदार लोगों से मिलने जाते और घर-घर तक यह बात पहुंच जाती कि चुनाव आ गया है और अबकी बार वोट डालने जाना है। देश आजाद होने के बाद पहले तीन चुनावों में जनता की वोटिंग में बड़ भागीदारी रही। समय के साथ ट्रेंड बदलता गया और आज एक ही परिवार के तीन लोगों को भी पता नहीं होता कि उनमें से कौन कब वोट डाल आया। 

ईवीएम का बटन दबाने में आजादी चाहता है हर शख्स : पूर्व केंद्रीय मंत्री सोमपाल शास्त्री

पूर्व केंद्रीय मंत्री सोमपाल शास्त्री कहते हैं कि ईवीएम का बटन दबाने में अब एक परिवार का भी हर शख्स स्वतंत्रता चाहता है। वह अपनी पसंद के नेता को वोट चुनना चाहता है और उसे अभिव्यक्त भी करता है। पहले उम्मीदवार गांव-गांव जाते जरूर थे पर सबसे मिलने के बजाय कुनबों, मोहल्लों, गांवों के मुखिया से ही मिलते थे। थोक के थोक आपस में बातचीत करके तय कर लेते थे कि कहां वोट करना है। वही संदेश परिवार की महिलाओं और युवाओं को दे दिया जाता था। तब यह वोटिंग के ठीक बाद यह अंदाजा लगाना भी आसान होता कि कौन जीत रहा है। अब हालात बदले हैं। पिता, पत्नी और पुत्र तीनों अब अलग-अलग प्रत्याशी को वोट कर रहे हैं। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में तो यह बड़े पैमाने पर देखने में आया कि परिवारों के बुजुर्गों ने एक दल को वोट दिया तो युवाओं ने किसी दूसरे दल को। महिलाएं भी कहां वोट डाल आईं यह बहुत से परिवारों को मतदान के बाद ही पता चला। इससे समीकरण, सियासत और समाज तीनों में बड़ा बदलाव आया है। 

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