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क्यों महज राज्यसभा के उप सभापति चुनाव तक सीमित नहीं थी भाजपा की रणनीति….

राज्यसभा में उप सभापति चुनाव में कांग्रेस से सीधी लड़ाई में जीत हासिल कर भाजपा ने भविष्य की रणनीति के संदेश दिए हैं। पार्टी ने एनडीए के अपने कुनबे को एकजुट रखने के साथ भविष्य के दोस्त भी तलाशे हैं, जो लोकसभा चुनाव में और उसकी बाद की स्थिति में मददगार होंगे। दूसरी तरफ उच्च सदन में अपनी ताकत से सरकार को डराने वाली विपक्ष की एकजुटता को भी भाजपा ने ध्वस्त कर दिया है। भाजपा ने साफ कर दिया है कि जरूरत पड़ने पर वह उच्च सदन में भी वह जीत का समीकरण बना सकती है।

राज्यसभा में उप सभापति पद को भाजपा व कांग्रेस में वर्चस्व व प्रतिष्ठा की जंग में अंकगणित पर राजनीतिक गणित भारी पड़ा है। कांग्रेस नेतृत्व अन्य विपक्षी दलों के साथ रणनीति में उलझा रहा। वहीं भाजपा ने ऐसे उम्मीदवार पर दांव लगाया, जिसे विपक्षी खेमे के निर्णायक बीजद का समर्थन भी हासिल हो सका। साथ ही अपने नाराज दोनों सहयोगी दलों शिवसेना व अकाली दल को भी साथ में बनाए रखा। सत्तापक्ष ने विपक्षी खेमे के एक सांसद का भी समर्थन जुटाने में सफलता हासिल की है।

आसान नहीं था तीनों दलों को साथ लाना
भाजपा की रणनीति केवल उप सभापति के चुनाव तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसमें लोकसभा चुनाव की प्रत्यक्ष व परोक्ष रणनीति भी शामिल रही। इसकी कमान खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह संभाले हुए थे। अन्नाद्रमुक, टीआरएस व बीजद का समर्थन हासिल करना आसान नहीं था, जबकि भाजपा इन तीनों दलों की सत्ता वाले राज्यों में खुद की ताकत बढ़ाकर चुनौती देने की तैयारी कर रही है।

बीजद के साथ नरम रहेंगे तेवर
खासकर ओडिशा में जहां आठ माह भाजपा व बीजद में ही लोकसभा व विधानसभा दोनों चुनावों में सीधी जंग होगी। बीजद को साधने के लिए तात्कालिक तौर पर भले ही नीतीश कुमार ने अहम भूमिका निभाई हो, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व अमित शाह ने भी नवीन पटनायक से बात यह संदेश तो दे ही दिया है कि आने वाले समय में भाजपा व बीजद में नया रिश्ता भी बन सकता है। आमने सामने के चुनाव में दोनों ज्यादा कटु नहीं रहेंगे और चुनाव बाद भाजपा को उसकी जरूरत भी पड़ सकती है।

तमिलनाडु में बन सकते हैं नए समीकरण
लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर सरकार के साथ रही अन्नाद्रमुक ने राज्यसभा में भी सत्तापक्ष का साथ दिया। तमिलनाडु की राजनीति में अन्नाद्रमुक की धुर विरोधी द्रमुक के कांग्रेस के साथ होने से लोकसभा चुनाव में भाजपा व अन्नाद्रमुक के बीच गठबंधन भी हो सकता है। तेलंगाना की सत्तारूढ़ टीआरएस ने भी भविष्य की रणनीति को देखते हुए सत्तापक्ष का समर्थन किया है। टीआरएस का रवैया केंद्र सरकार के साथ रिश्ते बेहतर रखना है।

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